काले अँधेरे सा फैला अकेलापन
और कभी बिस्तर की सलवटो में सिमटा सा
अनजान चेहरों में कभी
अपनों को ढूँढा करता है
रात बेरात जब भी आँखे बंद करती हु
उसे देखा करता है की जिसे
पहचाना नहीं अब तलक मैने
दिल की गहरायियो में रंज भी है
कही वफ़ा भी
सोच के की क्या यही अब से ज़िन्दगी है
हैरान भी हु और परेशान भी
कभी टटोलती, कभी संभलती,कभी खुद ही को समझाती हु
की वो राह जिसपर है जन्नत का नूर-ए-सबब

2 comments:
बेहतरीन लिखा है...
इतना कहना है तुझसे...
अब शक -शुबा की गुंजाईश ना रख
जो बढ़ गए कदम पीछे ना कर......
वफ़ा की राह पर धड़कने तेज़ हो जाती हैं...
बस दिल पे हाथ रख
दिल की सुन...दिल की कर.......
hmm beautifully said di,that's what i am doing waiting for 'the guiding light' to carry me through
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